India vs Bharat
आज फिर से जिंदगी के उसी दोराहे पर खड़ा हूँ, जहां से चला था कभी ये सोचकर की, बहुत कुछ करूंगा समाज के लिए, देश के लिए पर जाने क्यूँ जिंदगी थोड़ी मोहलत नहीं देती। जिंदगी तू थोड़ी थम तो जाती, मैं कोशिश कर लेता, इतनी कश्मकश से भर जाता हूँ, की टूटने ही पड़ता है इतनी तेज़ी से बदलने को तो नहीं कहा था तुम्हें, पर जाने क्यूँ जिंदगी थोड़ी मोहलत नहीं देती। चाहता हूँ जाऊ हर एक के पास और हाल-ए-दिल पूछ लूँ जी लूँ उसके हर के दर्द और पीड़ा को जो जख्म बन गए हैं इतनी बेबसी में जीते देखा है,की और अब देखा नहीं जाता , पर जाने क्यूँ जिंदगी थोड़ी मोहलत नहीं देती। कराहते लोगों के क्रंदन सुने हैं,उनके चीत्कार को महसूस किया है ना जाने कब ये गरीब भारत और अमीर इंडिया के बीच की खाई दूर होगी एक दिन तो जरूर आने को है जब दोनों एक हो जाएँगे, पर जाने क्यूँ जिंदगी थोड़ी और मोहलत नहीं देती।