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Showing posts from November, 2025
               कोई है...  कोई है जो आपको निःशब्द करना चाहता है, आपकी आवाज़ को दीवारों में कैद कर देना चाहता है, हाँ… वही है, जो इस खामोशी की तैयारी भी बड़े सलीके से कर रहा है। कोई है जो हर पल आपको डर के साये में रखना चाहता है, आपके आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खींच लेना चाहता है, हाँ… वो हर रात, हर सुबह, आपको डराने का नया बहाना ढूँढ रहा है। कोई है जो आपको भीड़ का एक साधारण हिस्सा बनाना चाहता है, जहाँ न आपकी पहचान हो, न सवाल, न आवाज़, हाँ… वो इस कोशिश में, एक-एक कर आपकी खासियत मिटाता जा रहा है। कोई है जो आपको सच से कोसों दूर रखना चाहता है, आपकी आँखों पर परत-दर-परत झूठ की धुंध चढ़ा रहा है, हाँ… वो बहुत हद तक सफल भी हो गया है, सच की चिंगारी को राख में बदलते हुए। कोई है जो नहीं चाहता कि आप तालीम की रोशनी तक पहुँचें, जो नहीं चाहता कि किताबें आपकी सोच को तेज करें, हाँ… वह हर रोज एक पन्ने फाड़ रहा है, ताकि आपकी समझ किसी को चुभ न जाए। कोई है जो आपकी मुस्कराहट तक को नियंत्रित करना चाहता है, आपके सपनों के आकार तक को छोटे दायरे में बाँध...
आजकल चोरी की घटनाएँ बढ़ रही हैं , हर कोई चिंतित हैं कि घर खाली कैसे छोड़ कर जाएँ।   तो क्यों न हम भी  चोरी  करें इस बार -  पर  इस बार अच्छाइयों की! 🌏✨ भारत के राज्यों से थोड़ी-थोड़ी “अच्छाई चोरी” कर लें? चलो, भारत के हर राज्य की खासियतें चुराकर एक सपनों वाला भारत बनाते हैं। 🇮🇳💫 📚🌿 केरल — शिक्षा, शांति और सौंदर्य की चोरी चुराते हैं केरल से — 100% साक्षरता का मंत्र गरीबी को जड़ से मिटाने का मॉडल पर्यटन को दुनिया में पहचान दिलाने की कला आयुर्वेद और उपचार में वैश्विक नेतृत्व और किसानों की वो मेहनत… जिसने मसालों, चाय और रबर में केरल को विश्व का सरताज बना दिया 🌶🍃 🏞💻 कर्नाटक — नवाचार और प्राकृतिक धरोहर की चोरी कर्नाटक से चुराते हैं — भारत की Silicon Valley बनाने का विज़न जंगलों, तीर्थों, महलों और धरोहरों को संभालने की समझ मैसूर पैलेस की चमक, हम्पी-पट्टडकल की विरासत उडुपी की सादगी, भोजन की परंपरा और आधुनिकता व प्रकृति का संतुलन बनाए रखने की बुद्धिमत्ता 🌳💡 🎓⚕️ तमिलनाडु — शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता की चोरी तमिलनाडु हम...
बच्चों के एडमिशन का मौसम - और हमारी बेवजह की घबराहट अभी एडमिशन का समय है। छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें अभी पेंसिल पकड़ना भी मुश्किल लगता है, उनके लिए कुछ स्कूल ऐसे तैयारी कर रहे हैं जैसे UPSC पास करने के बाद इंटरव्यू होने वाला हो। माता-पिता, दादा–दादी, चाचा–चाची—सबके मन में बस एक ही सवाल—  “बच्चे का एडमिशन होगा या नहीं?” कुछ महीनों पहले से मैं भी इसी माहौल से गुजरता रहा था। सितम्बर में अचानक पैरेंट्स के बीच एक बेचैन हलचल दिखी। सभी पेरेंट्स के दिलों दिमाग पर एक ही चिंता,  सब कोई फुसफुसाकर बस यही पूछ रहा था, सवाल कर रहा था — “कौन-सा स्कूल बेस्ट है?” साथ ही चेहरे पर तनाव, मन में आशंका, और दिल में डर- कि कहीं बच्चा ‘सही’ स्कूल से छूट न जाए! क्या सच में एडमिशन इतना मुश्किल है? या हमारी सोच? सच कहा जाए तो मुश्किल प्रवेश नहीं,  मुश्किल यह सोच है कि भविष्य सिर्फ स्कूल के नाम से तय होता है। मेरा असली फोकस यह है कि  हमारी चर्चाओं से बच्चों के मन में क्या असर हो रहा हैं? वे अभी बातें समझते नहीं, लेकिन भावनाएँ और टोन सब महसूस करते हैं। घर की बातें ही बच्चों में डर के बीज बोती हैं ...
कुछ मौतें आई दूर किसी शहर में, और कुछ मारे गए दिल्ली में।  कुछ के धर्म देखे गए , कुछ की जातियाँ पूछी गई। इंसान वो भी जो थे जो मरे वहाँ , और वो भी जो गुजर गए दिल्ली में ।  अब बताइए किसकी मौत बेहतर? या किसकी मौत बदतर ?  या दानों ही बदतर या दोनों ही बेहतर ? या कुछ कम बेहतर या कुछ कम बदतर ? आखिर इतना आसान क्यों है हमारा मार दिया जाना ? बस एक पल में , बस एक क्षण में, या बस यूं ही? मौत आम आदमी मरता है, कोई हर रोज, कोई एक पल में ही ।  फिर भी जिंदा रह जाते है बस उनके ही घरवाले ।  देश फिर भी चलता रहता है, लगातार, बिना रुके बिना थके।  फिर हम हर दिन क्यों जलते, दफन होते रहते है।  जिंदा रहने का हक हमसे हर दिन हर पल हर क्षण कौन छीन रहा है? क्यों अपनी मौत पर सवाल करें किसी से ? क्यों जिंदा रहने पर मलाल करें किसी से ? किसको पड़ी है कौन मारा गया? कौन बच गया?  किसकी मौत पर मनाएँ मातम ? किसकी मौत पर जलाएं दीये ? क्या महज एक आँकड़े है हम एक देश के लिए।  जब तक सवाल नहीं करेंगे अपने अस्तित्व का,  हम आँकड़े ही रहेंगे सरकार का , जिंदगी किसी की खैरात नहीं है ...
“धर्मेंद्र नहीं रहे!” — और फिर जो हुआ… 12 नवंबर 2025, दोपहर 1 :43 pm से 3:30 बजे तक की सच्चाई "धर्मेंद्र जी जीवित हैं, स्वस्थ हो रहे हैं, और उनका परिवार उनके स्वास्थ्य पर नियमित जानकारी दे रहा है।" लेकिन कुछ घंटे पहले, सोशल मीडिया पर यह “ख़बर” आग की तरह फैली — “The great legend Dharmendra is no more.” और फिर, जैसे किसी ने बटन दबा दिया हो, बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल, खुद को खोजी पत्रकार कहने वाले यूट्यूबर्स, फेसबुक-इंस्टा के महारथी, और स्टेटस लगाने वाले हर उम्र के लोग — बच्चे, जवान, अधेड़, बूढ़े, महिला, पुरुष — सब एक साथ सक्रिय हो गए। किसी ने सत्यापन नहीं किया। किसी ने परिवार से नहीं पूछा। बस “Breaking News” का मोह इतना गहरा था कि “सच की तह तक जाने” की जरूरत किसी को महसूस ही नहीं हुई। यही तो आज के सोशल मीडिया युग की सच्चाई है — सूचना नहीं, सबसे पहले सूचना देने की होड़। “मृत्यु अटल है, पर अफवाहें उससे भी तेज़” मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। उसे टाला जा सकता है, नकारा नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी की मौत तय समय से पहले “घोषित” कर दी जाती है, तो यह जल्दबाज़ी आखिर किसलिए...
कल सुबह एक बड़े ही अजीब पर प्यारे टाइप की घटना हुई. I was preparing for my daily chanting hymns and mantras ( मंत्र ) as usual, after taking a bath। By my side, my little daughter Anvesha was counting from 1 to 100 in Hindi in a very dedicated manner. (जो की उसके क्लास मे नहीं बताया जाता वैसे ही बच्चे किसी राशन दुकान /परचून/मार्ट/दुकान पर जाकर कन्फ्यूज़ होते हैं जैसे उनहत्तर मतलब 59 या उनयासी मतलब 89 😊)।खैर  I was losing my concentration. Honestly, I felt like scolding her hard unlike my nature and personality: "Just stop... let me complete my hymns and live in peace!" And to be honest, I did scold him from within. But then I stopped for a second and thought... If I gave her a scolding, she would understand that learning new things was less important than prayers and mantras. And this thought would stick in her mind for the rest of her life. Instead, I greeted her with a smile. And then the puja was done with contemplation. And the countdown continued. The moral of this story ...
भारतीय मूल की फिल्ममेकर मीरा नायर जिन्होंने सलाम बॉम्बे,मॉनसून वेडिंग,फायर,द नेमसेक,क्वीन ऑफ काटवे जैसी अनगिनत असाधारण फिल्मों का निर्माण किया,जिसने समाज के सोचने का तरीका बदल दिया.. Indian-origin filmmaker Mira Nair, who produced countless extraordinary films like Salaam Bombay, Monsoon Wedding, Fire, The Namesake, Queen of Katwe, etc., changed the way society thought. उनके पुत्र जोहरान ममदानी ने बहुत वर्षो के बाद एक लोकतान्त्रिक तरीके से सबको साथ लेकर चलने का नारा बुलंद किया जिसने बुलंदी को चुना।  His son Zohran Mamdani, after many years, raised the slogan of taking everyone along in a democratic manner, which chose the heights. ऐसा इसलिए भी क्योंकि New York जहाँ विश्व के हरेक कोने के लोग रहते हैँ जो अलग अलग जाति, धर्म, मजहब, बोली, भाषा, आस्तिक, नास्तिक, गरीब, अमीर, साधारण, आसाधरण हैँ. उन्होंने ना लेफ्ट देखा ना राइट। उन्होंने समावेशी विकास को चुना।  This is also because New York is home to people from every corner of the world, representing different castes, religions, sects...