हर एक दिन मन में एक सवाल उठता है—इस देश का युवा आखिर अपने भविष्य के बारे में क्या सोच रहा है? क्या वह सच में कुछ सोच भी रहा है, या बस बीते हुए मुद्दों में उलझकर अपने आज और आने वाले कल को नजरअंदाज कर रहा है? विश्व आज युद्ध की जद में है । शायद पूरा भारत अभी रामनवमी के उल्लास में हैं। युवा क्या चिंतित है? क्या उसे डर है की उसका भविष्य क्या होने वाला है आने वाले कुछ 5- 10 साल में? क्या जो रोजगार(सरकारी, गैर सरकारी) में भी हैं क्या वो नहीं चिंतित हैं की शायद जितना कमा रहे हैं वो कुछ बचा नहीं पाएंगे। क्या वह भी धीरे-धीरे एक ऐसी भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा है, जिसे बस मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान के इर्द-गिर्द ही दुनिया दिखाई देती है? क्या उसके सपनों की दिशा तय हो रही है, या वह दूसरों के बनाए हुए नैरेटिव में बहता जा रहा है? क्या उसे सिर्फ मौज-मस्ती सूझ रही है? या कभी वह किसी चौराहे, चौक, चौपाल पर बैठकर देश-दुनिया की असल स्थिति, उसकी चुनौतियाँ और संभावनाएँ समझने की कोशिश करता है? या फिर उसका संसार अब उसकी हथेली में सिमट चुका है—मोबाइल स्क्रीन में, जहाँ रील्स, शॉर्ट्स, लाइक्स और फॉलोअर्स ही ...
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IPL- Indian Pain League क्या यह एक क्रूर मज़ाक नहीं है? एक तरफ़ भारत जैसा विकासशील देश—जो अब भी अपनी ज़रूरतों के लिए कई हद तक बाहरी संसाधनों पर निर्भर है, और आत्मनिर्भर बनने का सपना शायद 2047 तक का लक्ष्य बनाकर चल रहा है… और दूसरी तरफ़ ज़मीन पर खड़ा आम इंसान—जो आज भी इस चिंता में जी रहा है कि उसे समय पर पेट्रोल, डीज़ल या रसोई गैस मिलेगी भी या नहीं। कुछ बड़े शहरों में आज भी लोग लाइनों में खड़े हैं— गैस सिलेंडर के लिए, ईंधन के लिए उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी अनिश्चितताओं में घिरी हुई है। और इसी देश में एक दूसरी तस्वीर भी है—जहाँ कुछ धनाढ्य लोगों की एक छोटी-सी दुनिया है, जिनके पास अकूत संपत्ति है…और जिनके लिए ये सारी परेशानियाँ सिर्फ़ “खबरें” हैं, हकीकत नहीं। सवाल उठता है—क्या आम आदमी की समस्याएँ सच में प्राथमिकता हैं? जब एक तरफ़ लोग अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हों, तो क्या दूसरी तरफ़ चमक-दमक, बड़े आयोजन और मनोरंजन ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए? Indian Premier League जैसे आयोजनों से क्या वास्तव में आम जनता को राहत मिल रही है? या यह सिर्फ़ एक ऐसा माध्यम बन गया है जहाँ से पैस...
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Being नास्तिक मैं आस्तिक से नास्तिक नहीं बल्कि और ज्यादा आस्तिक हो रहा हूँ। आपकी नजरों में हो सकता है आप मुझे नास्तिक कहें । चलो मान लेते हैं मैं नास्तिक ही बन रहा हूँ लेकिन मेरा ये नास्तिक होना आपकी आस्तिकता से भी ज्यादा आस्तिक है। ऐसा इसलिए क्योंकि ईश्वर के नाम पर फैलाई जा रही खोखली आस्था से मेरा दम घुटने लगा है जब आस्था सवालों से डरने लगे, जब पूजा संवेदना से ज़्यादा प्रदर्शन बन जाए, जब मंदिर जाने वाला हाथ इंसान को धक्का देने में न हिचके — तो मन पूछता है: क्या यही आस्तिकता है? मेरे लिए आस्तिक होना किसी मूर्ति के सामने सिर झुकाना नहीं है बल्कि मेरे लिए आस्तिकता का अर्थ है — उस मिट्टी को सम्मान देना, जिससे मैं बना हूँ उस हवा को धन्यवाद देना, जो मुझे साँस देती है उस पानी को पूजना, जो जीवन है उस सूर्य को प्रणाम करना, जो बिना भेदभाव रोशनी देता है क्या नहीं है प्रकृति में? जीवन है मृत्यु है सृजन है विनाश है न्याय है संतुलन है पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह प्रकृति से ही तो है। तो फिर मैं पूछता हूँ — क्या ईश्वर प्रकृति से अलग ...
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अगर आज वे झेल रहे हैं, तो कल हम भी हो सकते हैं आज जो ग़ज़ा, फ़िलिस्तीन, यूक्रेन, वेनेज़ुएला, ईरान और कई अफ़्रीकी देश झेल रहे हैं, क्या यह मान लेना ग़लत होगा कि कल हमारा नंबर भी आ सकता है ? अभी तो मान लीजिए हम बचे हुए हैं। कभी एक ताक़त को खुश करने की कोशिश, तो कभी दूसरी को नाराज़ होने से बचाने की कवायद। फिर भी आर्थिक प्रतिबंध लग ही जाते हैं — कभी इसके, कभी उसके। जो त्रासदी आज हमारे पड़ोसी देशों या दूर-दराज़ के इलाक़ों में हर दिन लोगों की ज़िंदगी निगल रही है, क्या वह सिर्फ़ “दूसरों की कहानी” है? या यह भविष्य की हमारी ही पटकथा है, जिसके पहले पन्ने कहीं और लिखे जा रहे हैं? अगर हम सिर्फ़ तुष्टीकरण करते रहेंगे, तो अपनी ज़िंदगी खुद कब जिएँगे? युवा क्या सोच रहा है? यह सबसे ज़रूरी सवाल है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठा युवा वर्तमान राजनीति को लेकर क्या सोच रहा है? क्या वह सच में खुश है? या खुशी अब बस इतनी ही रह गई है कि कहीं ताली बज रही है, कहीं थाली पीटी जा रही है, कहीं ढोल-डमरू गूंज रहे हैं। भगवा पहनकर खुलेआम गुंडागर्दी, “ॐ नमः शिवाय” कहते हुए किसी को धक्का देकर खुद को ...
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सरकार,नीतियाँ और आम आदमी: कुछ ज़रूरी सवाल अक्सर हम सुनते हैं कि सरकार जनता के लिए नीतियाँ बनाती है। लेकिन मन में बार-बार एक सवाल उठता है — आख़िर ये नीतियाँ तय कैसे होती हैं? कौन तय करता है? और किसके लिए? क्या सच में यह पता लगाया जाता है कि लोगों को क्या चाहिए, किसे कितना चाहिए और क्यों चाहिए? या फिर कुछ लोग ज़्यादा पा जाते हैं और कुछ लोग जीवन भर कुछ भी नहीं पा पाते — चाहे सही रास्ते से हो या टेढ़े रास्ते से? देश में आज भी ऐसे लोग हैं जो हर दिन खाने की चिंता में जीते हैं , जो पूरी ज़िंदगी अपनी बदहाली को कोसते हुए गुज़ार देते हैं। क्या उनके लिए भी कभी कोई नीति सच में बनाई जाती है? क्या AC कमरों में बैठकर ज़रूरतें तय की जा सकती हैं? यह एक कड़वा सच है कि ज़्यादातर नीतियाँ एसी कमरों में बैठकर बनाई जाती हैं। जिन लोगों ने कभी भूख नहीं सही, वे तय करते हैं कि गरीब को कितना अनाज चाहिए। जिन्होंने कभी मज़दूरी नहीं की, वे तय करते हैं कि मेहनत की कीमत क्या होनी चाहिए। क्या ऐसे में सही निर्णय संभव है? क्या सरकार सच में नीति बना रही है? कभी-कभी लगता है कि नीतियाँ ज़मीन पर सोचकर नहीं, बल्कि हवा में ...