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Showing posts from June, 2013

नक्सलवाद

आखिर ये शब्द है क्या , और उत्पत्ति इसकी कहाँ से हुई , और किस चीज को परिभाषित करने के लिए हुई ? आधा भारत इस शब्द से पीड़ित दिख रहा है।   क्या ये वास्तव मे इतनी खतरनाक है। दरअसल , नक्सलवाद एक मानसिक अवस्था है , जो कहीं   ना कहीं हर एक मन के भीतर में छुपी हुई है। जिनको नक्सलवाद का एक सदस्य मानते हैं वो भी हमारे समाज से निकले हुए हैं। आखिर उनको जरूरत क्यूँ पड़ी आम जीवन से हट कर , छुपकर नक्सलवाद की पनाह लेने की ? डर है कहीं ऐसा समय ना आ जाए की हम सब नक्सल बन जाएँ। प्रशासन की तमाम कोशिशें होती हैं उन्हे उन्मूलित करने के लिए , पर क्या उनका सफाया ही एक मात्र हल है। आखिर क्यूँ इतने प्रयासों के बावजूद उनके पाँव मजबूत और अधिकार क्षेत्र असीमित होता जा रहा है। क्या मुख्यधारा धारा से उनका जुड़ पाना इतना कठिन है.उनकी दुश्मनी आमलोगों से नहीं बल्कि प्रशासन तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं से है। पर क्यूँ ? दरअसल बात स्पष्ट है की वे नक्सली खुद नहीं बने हैं बल्कि मजबूर होकर बना दिये गए हैं। हक की बात है , जो या तो उनको दी नहीं गयी या फिर उनसे जबर्दस्ती छीन ली गयी। औद्योगिक तरक्की के लिए समाज...

ये किसकी मनमानी

समाचार चैनल का संवाददाता ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहा है , माँ गंगा को विद्ववंशीनी और सुरसा बता रहा है , प्रक्रति कर रही है अपनी मनमानी , गाँव , शहर , और सड़क तक भर आया है   बाढ़ का पानी . नदियों को सीमित करने वाले तटबंध टूट रहे हैं , और पानी को देखकर प्रशाशन के पशीने छूट रहे हैं , पानी की मार से जनता का जीवन दुश्वार हो रहा है , गंगा यमुना का पानी आपे से बाहर हो रहा है . बैराजों के दरवाजे चरमरा रहे हैं , और टिहरी जैसे बांध भी पानी रोकने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं , किसी ने कहा- पानी क्या है साहब , तबाही है तबाही , प्रकृति को सुनाई नहीं देती मासूमों की दुहाई . नदियों के इस बर्ताव से मानवता घायल हो जाती है , सच कहें , बरसात के मौसम मे नदियां पागल हो जाती हैं . ऐसा सुनकर माँ गंगा मुस्कराई और बयान देने जनता की अदालत में चली आई। जब कटघरे में आकर माँ गंगा ने   अपनी जुबान खोली , तो वो करुणा पूर्ण आक्रोश में कुछ यूं बोली- मुझे भी तो अपनी जमीन छिनने का डर सालता है , और मनुष्य , मनुष्य तो मेरी निर्मल धारा में केवल कूड़ा कर्कट डालता है , धार्म...

इंसान

आज हर कोई परेशान सा क्यूँ है ? आज हर कोई हैरान सा क्यूँ है ? जाने सुकून को ढूँढता सा क्यूँ है ? आज हर एक इंसान अंजान सा क्यूँ हैं ? चेहरे आज सबके डूबे से क्यूँ हैं ? पलकें आज सबकी नम सी क्यूँ हैं ? खामोशियान ही जाने जवाब देती क्यूँ है ? आज हर एक इंसान अंजान सा क्यूँ हैं ? पहले सा ना जाने भगवान नहीं क्यूँ है ? लकीर चिंताओं की मिटती नहीं क्यूँ हैं ? शिकन ना जाने खत्म होती नहीं क्यूँ हैं ? आज हर एक इंसान अंजान सा क्यूँ हैं ? कलियाँ आज फूल बनती नहीं क्यूँ हैं ? गलियाँ आज सिमटती सी क्यूँ हैं ? दिलों में घर कर जाना इतना मुश्किल क्यूँ है ? आज हर एक इंसान अंजान सा क्यूँ हैं ? दिलों को मिलाने की कोशिश करते नहीं क्यूँ हैं ? फासले आज दिलों की बढ़ाते दूरियाँ क्यूँ हैं ? हर एक जर्रा ना जाने आज मुरझाया सा क्यूँ है ? ना जाने आज शहर में हर इंसान अंजान सा क्यूँ है ?