नक्सलवाद





आखिर ये शब्द है क्या, और उत्पत्ति इसकी कहाँ से हुई, और किस चीज को परिभाषित करने के लिए हुई? आधा भारत इस शब्द से पीड़ित दिख रहा है।  क्या ये वास्तव मे इतनी खतरनाक है। दरअसल, नक्सलवाद एक मानसिक अवस्था है, जो कहीं  ना कहीं हर एक मन के भीतर में छुपी हुई है। जिनको नक्सलवाद का एक सदस्य मानते हैं वो भी हमारे समाज से निकले हुए हैं। आखिर उनको जरूरत क्यूँ पड़ी आम जीवन से हट कर, छुपकर नक्सलवाद की पनाह लेने की? डर है कहीं ऐसा समय ना आ जाए की हम सब नक्सल बन जाएँ।
प्रशासन की तमाम कोशिशें होती हैं उन्हे उन्मूलित करने के लिए, पर क्या उनका सफाया ही एक मात्र हल है। आखिर क्यूँ इतने प्रयासों के बावजूद उनके पाँव मजबूत और अधिकार क्षेत्र असीमित होता जा रहा है। क्या मुख्यधारा धारा से उनका जुड़ पाना इतना कठिन है.उनकी दुश्मनी आमलोगों से नहीं बल्कि प्रशासन तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं से है। पर क्यूँ?
दरअसल बात स्पष्ट है की वे नक्सली खुद नहीं बने हैं बल्कि मजबूर होकर बना दिये गए हैं। हक की बात है, जो या तो उनको दी नहीं गयी या फिर उनसे जबर्दस्ती छीन ली गयी।
औद्योगिक तरक्की के लिए समाज का एक तबका शूली पर चढ़ा दिया जाता है। औद्योगिक घराने जहां अरबों डॉलर उगाहते हैं, वहीं कुछ लोग मुख्य धारा से हटकर अपना हक पाने के लिए अस्त्रों-शस्त्रों की शरण में जा रहें हैं। उद्योग से करोड़ों रुपयों का राजश्व तो सरकार को दिखता है पर मासूम लोगों की वेदना उनसे देखि नहीं जाती। उन्हे उनके मूल से अलग कर दिया जाता है, उन्हे विश्थापित बना दिया जाता है. औद्योगीकरण से हम बाहरी दुनिया मे तो सबल दिख जाते हैं, पर हम अंदर से कहीं ना कहीं खोखले होते जा रहे हैं।
इस तरह के उत्थान या विकास की जरूरत हमें नहीं हैं, जो सिर्फ ऊपरी दिखावा है पर अंदर से गोलमाल है।डर है की कहीं हम शायद एक बार फिर से गुलाम ना बन जाएँ.अगर इस बार गुलाम हुए तो ना कोई गांधी आएगा ना कोई सुभाष। बस बंधकर रह जाएगे बेड़ियों में। फिर वही नक्सली, माओवादी क्रांतिकारी बनेंगे और लड़ेंगे प्रशासन से।
आखिर दमनकारी नीति ही क्यों? क्यों इनको कुचलने का प्रयास कर रही है सरकारें। क्यों हम नक्सलवाद को वृहद रूप लेने से रोकने में असमर्थ हैं। इसका हल आखिर क्या है?
एक बात तो आईने की तरह साफ हो गयी, जितना हम प्राकृतिक संसाधनो का अवैध या वैध रूप से दोहन करेंगे , यह समस्या उतनी ही बढ़ेगी।अप्राकृतिक खनन, वृक्ष काटकर उद्योगों को बनाने की प्रक्रिया एक तरफ तो गाँव के गाँव उजाड़ रही है, और दूसरी तरफ नक्सलवाद जैसी समस्या को और भी व्यापक बना देती है। क्या विकास इतना जरूरी है की हम अपनों को ही बेघर कर दें,विकासवाद का सिद्धांत आखिर क्या कहता है? क्या विकासशील से विकसित बनने की इतनी बड़ी कीमत हमें चूकानी ही पड़ेगी। आखिरकार हम होड़ क्यों करें अन्य देशों से? क्या विकास का मॉडल हम अपने मानदंडों से तय नहीं कर सकते। विकास तो अन्य देशों में भी होता है, पर नक्सल समस्या उन देशों मे नहीं है.ऐसे देश संसाधनो को उपयोग में लातें हैं पर उसकी क्षति को पूरा करने के लिया जरूरी नियामक भी अपनाते हैं। खामी अगर है तो क्या?और इसे दूर करने के लिए हम सरकार की बाँट क्यों देख रहें हैं? क्या हम कोई काम सरकार के बिना पूरा नहीं कर सकते। सरकार के भरोसे ना तो कभी हमारा काम हुआ है ना ही आगे कभी होने की संभावना ही है। उनकी विकास रैली, परिवर्तन रैली महज एक छद्म है,छलावा है,धोखा है। हमें सतर्क रहना होगा तथा जरूरी-गैरजरूरी में अंतर जानना होगा। आवेश में आकार हथियार उठा लेना समस्या का हल नहीं है, बल्कि हमें शांतिपूर्वक विरोध करना जरूरी है। इसमे सूप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बहुत ही जरूरी है। बिना उसके हस्तक्षेप समस्या का हल निकालना मुश्किल है।

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