कोई है... 

कोई है जो आपको निःशब्द करना चाहता है,

आपकी आवाज़ को दीवारों में कैद कर देना चाहता है,
हाँ… वही है,
जो इस खामोशी की तैयारी भी बड़े सलीके से कर रहा है।


कोई है जो हर पल आपको डर के साये में रखना चाहता है,
आपके आत्मविश्वास को धीरे-धीरे खींच लेना चाहता है,
हाँ… वो हर रात, हर सुबह,
आपको डराने का नया बहाना ढूँढ रहा है।


कोई है जो आपको भीड़ का एक साधारण हिस्सा बनाना चाहता है,
जहाँ न आपकी पहचान हो, न सवाल, न आवाज़,
हाँ… वो इस कोशिश में,
एक-एक कर आपकी खासियत मिटाता जा रहा है।


कोई है जो आपको सच से कोसों दूर रखना चाहता है,
आपकी आँखों पर परत-दर-परत झूठ की धुंध चढ़ा रहा है,
हाँ… वो बहुत हद तक सफल भी हो गया है,
सच की चिंगारी को राख में बदलते हुए।


कोई है जो नहीं चाहता कि आप तालीम की रोशनी तक पहुँचें,
जो नहीं चाहता कि किताबें आपकी सोच को तेज करें,
हाँ… वह हर रोज एक पन्ने फाड़ रहा है,
ताकि आपकी समझ किसी को चुभ न जाए।


कोई है जो आपकी मुस्कराहट तक को नियंत्रित करना चाहता है,
आपके सपनों के आकार तक को छोटे दायरे में बाँध देना चाहता है,
हाँ… वो आपकी उड़ान की सीमाएँ,
अपने नक्शे पर तय कर चुका है।


कोई है जो चाहता है कि आप थक जाएँ,
हार मान लें, सवाल पूछना छोड़ दें,
हाँ… वो आपकी थकान पर,
अपनी सत्ता की नींव मजबूत कर रहा है।


कोई है जो आपकी सोच में ज़हर घोल रहा है,
आपको अपने ही लोगों से दूर कर रहा है,
हाँ… वो आपके रिश्तों को,
अपने डर और भ्रम से तोड़ता जा रहा है।


लेकिन…
एक और "कोई" है,
जो अब भी भीतर कहीं जाग रहा है—
आपका विवेक, आपका साहस, आपका प्रश्न पूछने का हक।


वो कोई…
अगर जाग गया,
तो ये सारी तैयारियाँ,
सारा डर, सारी चालें—
एक पल में ध्वस्त हो जाएँगी। 


हाँ, बस देर न हो… सबेर न हो,
वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी कल—
“कहाँ थे आप जब अंधेरा फैल रहा था?
क्यों न उठी आपकी आवाज़
जब उठने का वक्त था?”


वे पूछेंगे—
“क्यों नहीं किया विरोध
जब मौका आपके सामने खड़ा था?
क्यों हमें इस दुर्दिन की आग में
धकेल दिया बिना लड़े?”


और तब,
जवाब देना मुश्किल हो जाएगा…
शब्द भी काँप उठेंगे,
आँखें भी झुक जाएँगी।


इसलिए—
अब भी समय है,
अब भी चिंगारी जल सकती है,
अब भी रास्ता बदला जा सकता है।


बस देर न हो…
बस देर न हो।




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