कुछ मौतें आई दूर किसी शहर में, और कुछ मारे गए दिल्ली में। 

कुछ के धर्म देखे गए , कुछ की जातियाँ पूछी गई।

इंसान वो भी जो थे जो मरे वहाँ , और वो भी जो गुजर गए दिल्ली में । 

अब बताइए किसकी मौत बेहतर? या किसकी मौत बदतर ? 

या दानों ही बदतर या दोनों ही बेहतर ?

या कुछ कम बेहतर या कुछ कम बदतर ?


आखिर इतना आसान क्यों है हमारा मार दिया जाना ?

बस एक पल में , बस एक क्षण में, या बस यूं ही?

मौत आम आदमी मरता है, कोई हर रोज, कोई एक पल में ही । 

फिर भी जिंदा रह जाते है बस उनके ही घरवाले । 

देश फिर भी चलता रहता है, लगातार, बिना रुके बिना थके। 

फिर हम हर दिन क्यों जलते, दफन होते रहते है। 


जिंदा रहने का हक हमसे हर दिन हर पल हर क्षण कौन छीन रहा है?

क्यों अपनी मौत पर सवाल करें किसी से ?

क्यों जिंदा रहने पर मलाल करें किसी से ?

किसको पड़ी है कौन मारा गया? कौन बच गया? 

किसकी मौत पर मनाएँ मातम ? किसकी मौत पर जलाएं दीये ?

क्या महज एक आँकड़े है हम एक देश के लिए। 


जब तक सवाल नहीं करेंगे अपने अस्तित्व का, 

हम आँकड़े ही रहेंगे सरकार का ,

जिंदगी किसी की खैरात नहीं है 

जो हम मांगे खुद अपने हक का किसी से । 

जब तक नहीं लड़ेंगे अपने खुद के वजूद को बचाने के लिए,

शायद, हाँ।  एक आँकड़े ही बनकर रह जाएंगे हम एक देश के लिए ।


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