बच्चों के एडमिशन का मौसम - और हमारी बेवजह की घबराहट
अभी एडमिशन का समय है।
छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें अभी पेंसिल पकड़ना भी मुश्किल लगता है, उनके लिए कुछ स्कूल ऐसे तैयारी कर रहे हैं जैसे UPSC पास करने के बाद इंटरव्यू होने वाला हो। माता-पिता, दादा–दादी, चाचा–चाची—सबके मन में बस एक ही सवाल— “बच्चे का एडमिशन होगा या नहीं?”
कुछ महीनों पहले से मैं भी इसी माहौल से गुजरता रहा था।
सितम्बर में अचानक पैरेंट्स के बीच एक बेचैन हलचल दिखी। सभी पेरेंट्स के दिलों दिमाग पर एक ही चिंता, सब कोई फुसफुसाकर बस यही पूछ रहा था, सवाल कर रहा था —
“कौन-सा स्कूल बेस्ट है?”
साथ ही चेहरे पर तनाव, मन में आशंका, और दिल में डर- कि कहीं बच्चा ‘सही’ स्कूल से छूट न जाए!
क्या सच में एडमिशन इतना मुश्किल है? या हमारी सोच?
सच कहा जाए तो मुश्किल प्रवेश नहीं, मुश्किल यह सोच है कि भविष्य सिर्फ स्कूल के नाम से तय होता है।
मेरा असली फोकस यह है कि हमारी चर्चाओं से बच्चों के मन में क्या असर हो रहा हैं?
वे अभी बातें समझते नहीं, लेकिन भावनाएँ और टोन सब महसूस करते हैं।
घर की बातें ही बच्चों में डर के बीज बोती हैं
जहाँ भी मैं गया, अधिकतर पैरेंट्स एक ही बात दोहराते दिखे—
-
“XYZ स्कूल में फॉर्म भर दिए क्या?”
-
“अरे, आपके बच्चे का XYZ में हुआ कि नहीं?”
-
“सुना है उस स्कूल में एडमिशन मिलना मुश्किल है…”
“सुना है वहाँ बहुत टफ इंटरव्यू होता है!”
यहाँ तक कि कुछ शिक्षकों को भी पैरेंट्स सिर्फ यही पूछते हुए पाए—
“मेम, बताइए XYZ स्कूल कैसा है?”
पर किसी ने एक बार भी नहीं सोचा—
क्या इन बातों से बच्चे पर दबाव नहीं बनता?
बच्चा नहीं जानता कौन-सा स्कूल अच्छा- हम ही उसे बताते हैं
मुझे खुशी है कि मैंने अपने बच्चे को यह तनाव महसूस नहीं होने दिया।
आखिर एक छोटे से बच्चे को क्या पता—
स्कूल का ब्रांड क्या है?
पर असल सवाल यह है—
हमारा पैमाना क्या है किसी स्कूल को अच्छा या बुरा मानने का?
हवाओं में चल रही बातों पर भरोसा करना कितना प्रैक्टिकल है?
हम उड़ती उड़ती बातों पर भरोसा कर लेते हैं।
किसी ने कहा—“वो स्कूल अच्छा है।”
हमने मान लिया।
किसी ने कहा—“वो स्कूल खराब है।”
हमने भी सिर हिला दिया।
क्या कभी पूछा कि
आखिर किस आधार पर?
शायद नहीं।
कभी पूछा—
“आपने किस आधार पर कहा कि अमुक स्कूल अच्छा/खराब है?”
शायद नहीं।
स्कूल कोई जादुई औषधि नहीं देते न ही स्कूल कोई मैजिक पॉशन पिलाता है
हम भूल जाते हैं कि:
-
हर बच्चे की बुद्धि अलग होती है
-
हर बच्चे की सीखने की गति अलग होती है
-
हर बच्चे की रुचि अलग होती है
स्कूल बच्चे को ‘इंटेलिजेंट बनाने की दवा’ नहीं पिलाते।
पढ़ाई का सिलेबस हर जगह लगभग एक सा है।
अंतर पैदा करता है—
बच्चे का नजरिया, अनुशासन, माहौल और माता-पिता की सोच।
अगर प्राइवेट स्कूल ही भविष्य की गारंटी होते,
तो क्या सरकारी स्कूलों से निकलकर IAS–IPS, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, लेखक और बिज़नेस लीडर नहीं आते?
स्थानीय स्तर पर किन राज्यों ने सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारी?
भारत में कई राज्यों ने यह साबित किया कि
अगर इच्छा हो, तो सरकारी स्कूल निजी स्कूलों को भी पीछे छोड़ सकते हैं।
1️⃣ दिल्ली (Delhi Model of Education)
-
“हैप्पीनेस क्लास”, “डिजिटल क्लासरूम”, “Deshbhakti Curriculum”
-
स्कूलों का इंफ्रास्ट्रक्चर निजी स्कूलों जैसा
-
टीचर्स की ट्रेनिंग विदेशों तक
दिल्ली के सरकारी स्कूल राष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण बने।
2️⃣ केरल (Kerala)
-
भारत की सबसे अधिक साक्षरता
-
सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम
-
ICT लैब्स, मजबूत टीचर ट्रेनिंग
परिणाम: प्राइवेट से सरकारी स्कूलों में एडमिशन बढ़ा।
3️⃣ राजस्थान
-
"शाला दर्पण" पोर्टल
-
लड़कियों और ग्रामीण बच्चों के लिए मजबूत सुविधाएँ
-
नए स्कूल भवन, डिजिटल लाइब्रेरी
आज कई जिलों में सरकारी स्कूलों का रिज़ल्ट प्राइवेट से बेहतर।
4️⃣ हिमाचल प्रदेश
-
देश के सबसे स्वच्छ और सुव्यवस्थित सरकारी स्कूल
-
टीचर्स की नियमित ट्रेनिंग
-
साइंस लैब, लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब
हिमाचल के सरकारी स्कूल मॉडल को कई राज्यों ने अपनाया।
5️⃣ ओडिशा (Odisha)
-
5T शिक्षा मॉडल
-
“Mo School” अभियान—लोकल लोग स्कूल सुधार में शामिल
-
बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार
इससे सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता तेजी से बढ़ी।
इन राज्यों ने साबित किया—
समस्या प्राइवेट या सरकारी होने की नहीं है; समस्या सोच और प्रबंधन की है।
तय आपको करना है—आप चुनेंगे स्कूल या बच्चों का भविष्य?
अब रिज़ल्ट आ गए हैं।
कहीं खुशी है, कहीं बेचैनी, कहीं निराशा।
लेकिन अंत में निर्णय आपका है—
✔ क्या आप सिर्फ स्कूल का नाम चुनेंगे?
✔ या बच्चे का असली भविष्य—जो उसकी खुशी, रुचि और मानसिक संतुलन में है?
क्योंकि सच यही है—
स्कूल इमारत बनाता है, पर बच्चा अपना भविष्य खुद बनाता है।
हमारा काम है उसे तनाव नहीं, सहयोग देना।
Comments
Post a Comment