आज कुछ अतरंगी सोचते हैं। 2026 ई से करीब 4000 साल पहले चलते हैं 2026 ई॰ पू॰ में। सभ्यता की वह लंबी यात्रा जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं जब हम कैलेंडर देखते हैं , तो 2026 हमें भविष्य की तरह दिखाई देता है। योजनाएँ , लक्ष्य , तकनीक , सपने — सब आगे की ओर टिके होते हैं। लेकिन कभी ठहरकर यह सोचें कि 2026 ई॰पू॰ भी कभी किसी का “आज” रहा होगा । उस समय भी लोग सुबह उठते होंगे , काम पर जाते होंगे , बच्चों को सिखाते होंगे और भविष्य के बारे में सोचते होंगे — ठीक हमारी तरह। उस दौर में , जब सिंधु घाटी सभ्यता में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो अपनी चरम अवस्था में थे , किसी को यह अहसास नहीं था कि वे इतिहास रच रहे हैं। वे बस जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे थे और शायद यही मानव सभ्यता का सबसे बड़ा रहस्य है — इतिहास जानबूझकर नहीं रचा जाता , वह रोज़मर्रा के छोटे निर्णयों से बनता है। सभ्यता की बुनियाद: ईंट और अनुशासन हड़प्पा सभ्यता को देखकर आज भी आश्चर्य होता है। वहाँ न भव्य महलों का दिखावा था , न देवताओं की विशाल मूर्तियाँ। फिर भी वह सभ्यता असाधारण थी , क्योंकि उसने मानव जीवन को व्यवस्थित किया। सीधी सड़कें , ...
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Showing posts from December, 2025
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आखिर ये कैसा भारत देश बना रहे हम ? आखिर ये कैसा देश बना रहे हम ? वास्तव में अब डर गया हूँ। कहीं भी जाने में डर लगता है—चाहे सड़क हो , बाजार हो , ट्रेन हो या हवाई जहाज। रात को घर से बाहर निकलो , तो सोचता हूँ कौन सा रास्ता लूँ ? कौन सी भीड़ दिखेगी ? अपने ही लोगों से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी। आज आपकी सत्ता है , कुर्सी पर विराजमान हो , जयजयकार सुन रहे हो , हेलीकॉप्टर से फूल बरसा रहे हो। लेकिन हमेशा तो ये नहीं रहेगी। एक दिन सत्ता का नशा उतरेगा , चुनाव हार जाओगे , आप भी अकेले पड़ जाओगे। वो एकजुट रहने का दंभ , वो भीड़ का सहारा , वो सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी—सब टूट जाएगा। ये सब आपसी लड़ाई में झुलसकर दम लेंगे। भाई-भाई का दुश्मन बनेगा , पड़ोसी पड़ोसी को निगल जाएगा। भोपाल में उमराह यात्रियों पर हमला हो गया , क्या मिला ? सिर्फ शर्म। नहीं संभल पाएंगे , क्योंकि नफरत की आग बुझाने का पानी कहाँ बचेगा ? पानी तो नेताओं ने बेच दिया देशी विदेशी कंपनियों को। सरकार शायद सबको डराना चाह रही है। एक खौफनाक उदाहरण सेट करना चाहती है—विद्रोहियों को कुचलकर , आवाज दबाकर , बोलने की आजादी खत्म करके। सोचिए , किस देश म...
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गिर गया रुपया ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ ₹ गिरने दोOOOOOOOOOOOO चढ़ गया डॉलरRRRRRRRRR चढ़ने दोOOOOOOOOOOO काहे का डर है? विकसित भारत है , छोड़ो बहाना न न न गिरता रुपया: संकट नहीं, अवसर — एक सकारात्मक दृष्टि हर बार जब रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता है, तो देश में एक नई बहस छिड़ जाती है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक, इसे राष्ट्रीय असफलता की तरह पेश किया जाता है। लेकिन सवाल यह है — क्या गिरता रुपया सच में केवल चिंता का विषय है? या फिर इसे हम एक “blessing in disguise” यानी छिपा हुआ अवसर मान सकते हैं? क्या रुपया आज़ादी के बाद कभी मज़बूत हुआ? आंकड़े खुद कहानी कहते हैं: 1947 : 1 डॉलर = ₹3.30 1966 : युद्ध और सूखे के बाद अवमूल्यन 1991 : भुगतान संकट, 1 डॉलर ≈ ₹22.74 2000 : लगभग ₹45 2025 : ₹90 के पार सच यह है कि रुपया आज़ादी के बाद से लगातार गिरा है , चाहे सरकार कोई भी रही हो। फिर भी भारत आज दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में है। तो सवाल उठता है — अगर रुपया कभी मज़बूत नहीं हुआ, फिर भी हम आगे कैसे बढ़े? इति...
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English का एक word हैं introspection ओर बेहतर कहें तो self introspection. तो आज सिर्फ और सिर्फ सवाल वो भी देश के भावी युवा से !! आज मैं भारत के हर युवा से पूछना चाहता हूँ— आख़िर चल क्या रहा है? देश में , समाज में, उनके निजी जीवन में, परिवार में , विदेश में? जब भी किसी युवा को देखता हूँ, मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है— वह आज क्या सोच रहा है? क्या वो सच में कुछ सोच रहा है या बस ऐसे ही चलते जा रहा है हवाओ के साथ ? क्या वो सोच रहा है अपने भविष्य के बारे में? अपने देश के बारे में? अपने समाज, परिवार और खुद अपनी पहचान को लेकर? मैं पूछना चाहता हूँ कि युवा के मन में कौन कौन से सवाल हैं? क्या आज का युवा एक साथ कई दुनियाओं में जी रहा है? निजी जीवन में: नौकरी मिलेगी या नहीं, क्या उस अनुरूप उसके पास वो तमाम विधाएं हैँ या लाने का प्रयास कर रहा है? जो पढ़ाई की है, उसका उपयोग होगा या नहीं? मानसिक तनाव, तुलना और असुरक्षा क्यों बढ़ रही है सोचता है ? परिवार में : परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन कैसे बने? क्या वो सामंजस्य बिठा रहा है? समाज में : क्या बराबरी, सम्मान, सुरक्षा और ...