आखिर ये कैसा भारत देश बना रहे हम?
आखिर ये कैसा देश बना रहे हम? वास्तव में अब डर गया हूँ। कहीं भी जाने में डर लगता
है—चाहे सड़क हो, बाजार हो, ट्रेन हो या हवाई जहाज। रात को घर से बाहर निकलो, तो सोचता हूँ
कौन सा रास्ता लूँ? कौन सी भीड़ दिखेगी? अपने ही लोगों से ऐसी
उम्मीद तो नहीं थी। आज आपकी सत्ता है, कुर्सी पर
विराजमान हो, जयजयकार सुन रहे हो, हेलीकॉप्टर से फूल बरसा रहे हो। लेकिन हमेशा तो ये नहीं
रहेगी। एक दिन सत्ता का नशा उतरेगा, चुनाव हार जाओगे, आप भी अकेले पड़ जाओगे। वो
एकजुट रहने का दंभ, वो भीड़ का सहारा, वो सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी—सब टूट जाएगा। ये
सब आपसी लड़ाई में झुलसकर दम लेंगे। भाई-भाई का दुश्मन बनेगा, पड़ोसी पड़ोसी
को निगल जाएगा। भोपाल में उमराह यात्रियों पर हमला हो गया, क्या मिला? सिर्फ शर्म।
नहीं संभल पाएंगे, क्योंकि नफरत की आग बुझाने का पानी कहाँ बचेगा? पानी तो नेताओं
ने बेच दिया देशी विदेशी कंपनियों को।
सरकार शायद सबको डराना चाह रही है। एक खौफनाक उदाहरण सेट करना चाहती
है—विद्रोहियों को कुचलकर, आवाज दबाकर, बोलने की आजादी खत्म करके। सोचिए, किस देश में पत्रकार जेल
में सड़ते हैं, किसान सड़कों पर मरते हैं, और विरोध करने वाला लटकाया
जाता है? 2024 में किसान आंदोलन में शुभकारण सिंह की मौत हुई, लाठीचार्ज में
सैकड़ों घायल। जेएनयू में हमला हुआ, छात्रों पर डंडे बरसे।पर्यावरण बचाने सड़क पर गुहार किया तो अरेस्ट कर लिए गए सैकड़ों पर्यावरण प्रेमी। आप या तो सरकार के साथ
रहिए या फिर सरकार के साथ रहिए। कोई तीसरा विकल्प नहीं। सरकार को विरोध स्वीकार
नहीं। उसे अपना सब कुछ परफेक्ट लगता है—अपने लोग, अपना दंभ, अपना दुस्साहस,
अपना स्वीकारण,
अपनी जयजयकार,
अपना धर्म,
अपने भगवान,
अपना व्यवसाय।
विरोध का एक स्वर भी नहीं सहन। अगर किसी ने सवाल उठाया, तो देशद्रोही ठहरा दो,
जासूस बता दो,
भीड़ बुला लो। CAA-NRC
के खिलाफ बोलो
तो पाकिस्तानी एजेंट, किसान हित बोलो तो खालिस्तानी।
देखिए ना, कैसे सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी तैनात है। एक पोस्ट लिखो,
सवाल करो,
तो गालियाँ,
धमकियाँ,
बलात्कार-हत्या
की धमकी। असल जिंदगी में तो और बुरा। अपने धर्म की जयजयकार करते हुए दूसरे धर्म पर
पत्थर मारना, मस्जिद तोड़ना, चर्च जलाना। हाल ही में हल्द्वानी में मस्जिद पर बुलडोजर
चला, दंगे भड़के, 5 मरे। मणिपुर में ईसाई गांव जलाए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार के
वीडियो वायरल। आखिर हो क्या रहा है? धर्म हमें क्या सिखाता है? गीता कहती है
अहिंसा परमो धर्म:, कुरान कहता है सब्र और न्याय, बाइबल कहता है पड़ोसी से
प्रेम करो, गुरु ग्रंथ साहिब कहता है सर्वे सुख। निश्चित ही असहिष्णु होने की बात तो कोई
धर्म नहीं करता। फिर ये उन्माद कहाँ से आया? कोई wrong नंबर लग गया है । आखिर कौन-सा धर्म अपनाएँ?
धर्म बताने में
भी डर लगता है। आजकल नाम लिया तो संदिग्ध, मंदिर गया तो गुंडा, मस्जिद गया तो आतंकी,
चर्च गया तो
कन्वर्जन वाला। क्या हम गुंडे पैदा कर रहे हैं? जिधर देखो, दूसरे धर्म को
देखकर असहिष्णु हो जाना। दुकान पर जाओ, तो पूछा जाता है कौन सा धर्म? पड़ोस में शादी
हो, तो धर्म देखकर न्योता। स्कूल में बच्चे बाँटे जा रहे हैं—ये हिंदू, वो मुस्लिम,
ये सिख,
वो ईसाई।
दिल्ली में सोनम राठी नाम की लड़की साइकिल पर सवार लड़के को देखकर
"पाकिस्तानी" बता रही थी, भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। क्या था अपराध?
बस साइकिल
चलाना।
क्या संविधान का अनुच्छेद 25 अपने धर्म को मानने की आजादी नहीं
देता? "सभी व्यक्तियों को स्वतंत्रतापूर्वक अपने धर्म का पालन, अभ्यास और प्रचार करने का
अधिकार।" फिर क्यों दूसरे धर्म के लोगों को देखकर तंज कसना, हमला करना?
संविधान फाड़
दो अगर इतनी जलन है। धर्म हिंसा की इजाजत नहीं देता। लेकिन हम भूल गए हैं। आज हम
बदला ले रहे हैं—पुराने घावों का, बाबरी का, गुजरात 2002 का, कश्मीर का, 1984 सिख दंगों का। शायद वो कल लें—हमसे न लें तो
हमारे बच्चों से, हमारे परिचितों से। कल अगर सत्ता मुसलमानों या दलितों के
हाथ लगी, तो वही बुलडोजर तुम्हारी मंदिरों पर चलेगा। क्या मिलेगा? खून ही खून।
क्या ऐसा करके जीत जाने वाले हैं हम? अगर ऐसे जीत लेंगे, तो एक बार में ही काम तमाम
कर दो। सबको खत्म कर दो—मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध , दलित पिछड़े—फिर शासन करो। लेकिन तब कौन ताली बजाएगा? कौन वोट देगा?
खाली सड़कें,
खाली बाजार,
खाली
मंदिर—क्या बचेगा? सिर्फ कंकाल।
ये देश आजादी के लिए लड़ा था, गांधी-नेहरू-अंबेडकर ने सपना देखा था—सर्वधर्म समभाव का,
सेक्युलर का।
लेकिन आज? विभाजन की यादें ताजा हो रही हैं। 1947 में लाखों मरे, घर छोड़े। आज
फिर वही हो रहा—हिंदू-मुस्लिम दंगे, सिखों पर अत्याचार, ईसाइयों पर हमले। सरकार चुप,
पुलिस तमाशबीन,
कोर्ट में
सालों लग जाते। एजेंसी सब सत्ता के गुलाम। नेता बोलते हैं विकास, लेकिन असल में
नफरत का कारोबार चला रहे। कहते हैं "राष्ट्र पहले", लेकिन राष्ट्र
तो एकता से बनता है, नफरत से नहीं। क्या "सबका साथ, सबका
विकास" का नारा खोखला हो गया। अब तो "सबका साथ, लेकिन हमारे साथ" बन
गया। चुनाव में वोट ले लो धर्म के नाम पर, फिर भूल जाओ गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई।
भाइयों-बहनों, संभल जाओ। ये रास्ता गलत है। कल अगर सत्ता बदल गई, तो वही बदला
तुमसे लेंगे। इतिहास गवाह है—बाबर ने लिया, अंग्रेजों ने लिया, इंदिरा
हत्याकांड के बाद सिखों से लिया, आज हम ले रहे। कल? डर है। डर इस बात का कि मेरे बच्चे इस देश में
कैसे बड़े होंगे—स्कूल में मारपीट, नौकरी में भेदभाव। डर इस बात का कि दोस्ती नाम की चीज खत्म
हो जाएगी, प्यार के नाम पर लव जिहाद के केस। डर इस बात का कि हम इंसान नहीं, जानवर बन
जाएंगे—भीड़ बनकर किसी को चबा जाएंगे। जागो, एक हो जाओ। धर्म को दिल में
रखो, लेकिन सिर पर न चढ़ाओ। संविधान को मानो, नेताओं को नहीं। बोलो,
सवाल करो,
लेकिन हिंसा मत
करो। वरना ये देश नहीं बचेगा—ये जंगल बन जाएगा, जहाँ कानून का राज नहीं,
गुंडों का राज
होगा। मजहब के ठेकेदारों का राज। तब पछताओगे, लेकिन देर हो चुकी होगी।
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