अगर आज वे झेल रहे हैं, तो कल हम भी हो सकते हैं

आज जो ग़ज़ा, फ़िलिस्तीन, यूक्रेन, वेनेज़ुएला, ईरान और कई अफ़्रीकी देश झेल रहे हैं,
क्या यह मान लेना ग़लत होगा कि कल हमारा नंबर भी आ सकता है?

अभी तो मान लीजिए हम बचे हुए हैं।
कभी एक ताक़त को खुश करने की कोशिश,
तो कभी दूसरी को नाराज़ होने से बचाने की कवायद।
फिर भी आर्थिक प्रतिबंध लग ही जाते हैं —
कभी इसके, कभी उसके।

जो त्रासदी आज हमारे पड़ोसी देशों या दूर-दराज़ के इलाक़ों में
हर दिन लोगों की ज़िंदगी निगल रही है,
क्या वह सिर्फ़ “दूसरों की कहानी” है?
या यह भविष्य की हमारी ही पटकथा है,
जिसके पहले पन्ने कहीं और लिखे जा रहे हैं?

अगर हम सिर्फ़ तुष्टीकरण करते रहेंगे,
तो अपनी ज़िंदगी खुद कब जिएँगे?


युवा क्या सोच रहा है?

यह सबसे ज़रूरी सवाल है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठा युवा
वर्तमान राजनीति को लेकर क्या सोच रहा है?
क्या वह सच में खुश है?

या खुशी अब बस इतनी ही रह गई है कि
कहीं ताली बज रही है,
कहीं थाली पीटी जा रही है,
कहीं ढोल-डमरू गूंज रहे हैं।

भगवा पहनकर खुलेआम गुंडागर्दी,
“ॐ नमः शिवाय” कहते हुए
किसी को धक्का देकर
खुद को सही ठहरा लेना।

क्या यही आस्था है?
क्या यही राष्ट्रभक्ति है?


खुशी आखिर किसमें है?

युवाओं को खुशी किसमें मिलती है?

  • दूसरों को डराने में?

  • किसी भीड़ का हिस्सा बन जाने में?

  • या मोबाइल स्क्रीन पर
    रोज़ का डेटा कोटा खत्म कर देने में?

दूर देशों के लोग हमें देखकर क्या सोचते होंगे?
क्या वे हमें एक जागरूक समाज के रूप में देखते होंगे,
या एक ऐसी भीड़ के रूप में
जो शोर तो बहुत करती है,
पर सवाल पूछने से डरती है?

क्या जीवन का अंतिम लक्ष्य
बस “जिंदा रहना” ही है?
या इस ज़मीन के प्रति,
इस समाज के प्रति,
इस देश के प्रति
कुछ कर्तव्य भी हैं?


अगर कल हमला हुआ तो?

अगर हालात यूँ ही बिगड़ते रहे
और कल सच में हमला हो गया —
तो क्या हम तैयार हैं?

या फिर हम वही करेंगे
जो सदियों से भीड़ करती आई है —
भेड़-बकरी की तरह
एक-दूसरे के पीछे चल देना?

यह सोचकर कि
“जो होगा, सबके साथ होगा।”

कुछ लोगों ने शायद तैयारी कर ली है —
अपने-अपने लिंक जोड़ लिए हैं,
अपने-अपने सुरक्षित ठिकाने बना लिए हैं।

और बाकी?
बाकी सिर्फ़ तमाशा देख रहे हैं।


एक अंतिम और आख़िरी सवाल

क्या हम एक समाज के रूप में
सोचने की ताक़त खोते जा रहे हैं?
या जानबूझकर छोड़ते जा रहे हैं?

क्योंकि इतिहास गवाह है —
जो समाज सवाल पूछना छोड़ देता है,
वह बहुत पहले हार चुका होता है,
भले ही वह हार उसे
सालों बाद दिखाई दे।

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