सरकार,नीतियाँ और आम आदमी: कुछ ज़रूरी सवाल
अक्सर हम सुनते हैं कि सरकार जनता के लिए नीतियाँ बनाती है। लेकिन मन में बार-बार एक सवाल उठता है — आख़िर ये नीतियाँ तय कैसे होती हैं? कौन तय करता है? और किसके लिए?
क्या सच में यह पता लगाया जाता है कि लोगों को क्या चाहिए, किसे कितना चाहिए और क्यों चाहिए? या फिर कुछ लोग ज़्यादा पा जाते हैं और कुछ लोग जीवन भर कुछ भी नहीं पा पाते — चाहे सही रास्ते से हो या टेढ़े रास्ते से?
देश में आज भी ऐसे लोग हैं जो हर दिन खाने की चिंता में जीते हैं, जो पूरी ज़िंदगी अपनी बदहाली को कोसते हुए गुज़ार देते हैं। क्या उनके लिए भी कभी कोई नीति सच में बनाई जाती है?
क्या AC कमरों में बैठकर ज़रूरतें तय की जा सकती हैं?
यह एक कड़वा सच है कि ज़्यादातर नीतियाँ एसी कमरों में बैठकर बनाई जाती हैं।
जिन लोगों ने कभी भूख नहीं सही, वे तय करते हैं कि गरीब को कितना अनाज चाहिए।
जिन्होंने कभी मज़दूरी नहीं की, वे तय करते हैं कि मेहनत की कीमत क्या होनी चाहिए।
क्या ऐसे में सही निर्णय संभव है?
क्या सरकार सच में नीति बना रही है?
कभी-कभी लगता है कि नीतियाँ ज़मीन पर सोचकर नहीं, बल्कि हवा में अंदाज़ा लगाकर बना दी जाती हैं। थोड़ा बहुत दिमाग़ लगाया, कुछ आँकड़े देखे, और योजना घोषित कर दी। अगर मूल्यांकन सही होता, तो आज इतनी आर्थिक असमानता, सामाजिक असमानता और लैंगिक विषमता क्यों बची रहती?
जो पीछे रह जाते हैं, उनके लिए कौन सोचता है?
अगर योजनाएँ उन्हीं के लिए हैं, तो वे आज भी उसी हालत में क्यों हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि — योजना उनके नाम पर बनती है, लेकिन लाभ कोई और ले जाता है — पूरा नहीं तो आधा, या थोड़ा ही सही। जो सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद है, वही सबसे ज़्यादा सिस्टम से बाहर क्यों रह जाता है?
योजनाओं का प्रचार, समाधान क्यों नहीं?
एक और सवाल परेशान करता है — सरकारें अपनी योजनाओं का इतना प्रचार क्यों करती हैं? करोड़ों रुपये विज्ञापनों में बहा दिए जाते हैं, लेकिन क्या उतनी मेहनत अच्छी योजना बनाने में होती है? क्या कभी जिनके लिए योजना बनती है,उनसे पूछा जाता है —
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तुम्हें क्या चाहिए?
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तुम्हें किससे खुशी मिलेगी?
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तुम्हारी असली समस्या क्या है?
या फिर लोग सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह गए हैं? या सिर्फ़ वोट बैंक?
दूरदर्शिता कहाँ गई?
हम क्यों नहीं 5–10 साल आगे का स्पष्ट खाका बनाते? क्यों हर बार कॉपी-पेस्ट विकास मॉडल अपनाते हैं?
विकसित देशों की —
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जनसंख्या अलग है
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संसाधन अलग हैं
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सोच और संस्कृति अलग है
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ज़िम्मेदारियाँ और परिस्थितियाँ अलग हैं
तो फिर अंधा अनुकरण क्यों? क्यों न हम अपने देश के हिसाब से अपना विकास का पैमाना तय करें?
व्यवस्था कौन सुधारेगा?
खराब व्यवस्था को सुधारने की ज़िम्मेदारी किसकी है? अगर हम नहीं सुधरेंगे, तो कौन सुधरेगा?
अगर युवा नहीं सोचेंगे, तो कौन सोचेगा? क्या हम नैतिक (ethical) सोच भी नहीं रख सकते?
युवा और राष्ट्र: एक कठिन सवाल
आज युवाओं से एक सीधा सवाल पूछना ज़रूरी है — धर्म पहले या राष्ट्र पहले? क्या सच को सच और झूठ को झूठ कहने की हिम्मत कम होती जा रही है? जिन देशों ने जैसे जापान, चीन, साउथ कोरिया , जर्मनी, विकास किया,
वहाँ लोगों ने —
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एक साझा सपना देखा
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एक स्पष्ट विज़न रखा
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और राष्ट्र को प्राथमिकता दी
कोई भी देश अपने लोगों के बिना आगे नहीं बढ़ सकता।
अंधभक्ति की राजनीति
आश्चर्य होता है जब लोग कहते हैं — “हम तो फलाँ पार्टी के कट्टर वोटर हैं, सही करे या गलत।” अगर गलत है, तो सही को वोट क्यों नहीं? क्या यह सोच वाकई समझदारी भरी है कि “हम पहले भी इसी को वोट देते थे, आगे भी देंगे — चाहे कुछ भी हो”? ईमानदारी से कहें तो ऐसे लोगों को अक्सर समाज के लिए कुछ सकारात्मक करते नहीं देखा जाता ना ही वो ऐसी सोच लेकर चलते हैं जिससे समाज का भला हो, ना ही ऐसी चीजें उनके जहन में भी रहती हैं। दुख तब होता है जब बहस में जाति और धर्म घसीट लाए जाते हैं और असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
अंत में
यह देश किसी एक पार्टी, धर्म या जाति का नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों का है जो सम्मान, अवसर और न्याय के साथ जीना चाहते हैं। जब तक हम सवाल नहीं पूछेंगे,सोच नहीं बदलेंगे,और राष्ट्र को प्राथमिकता नहीं देंगे — तब तक नीतियाँ बनती रहेंगी, लेकिन ज़मीनी हकीकत नहीं बदलेगी।
देश कोरी कल्पनाओ से नहीं,
देश बदलता है जागरूक नागरिकों से।
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