Being नास्तिक 

मैं आस्तिक से नास्तिक नहीं बल्कि और ज्यादा आस्तिक हो रहा हूँ। आपकी नजरों में हो सकता है आप मुझे नास्तिक कहें । चलो मान लेते हैं मैं नास्तिक ही बन रहा हूँ लेकिन मेरा ये नास्तिक होना आपकी आस्तिकता से भी ज्यादा आस्तिक है। ऐसा इसलिए क्योंकि

ईश्वर के नाम पर फैलाई जा रही खोखली आस्था से मेरा दम घुटने लगा है जब आस्था सवालों से डरने लगे, जब पूजा संवेदना से ज़्यादा प्रदर्शन बन जाए, जब मंदिर जाने वाला हाथ इंसान को धक्का देने में न हिचके — तो मन पूछता है:क्या यही आस्तिकता है?


मेरे लिए आस्तिक होना  किसी मूर्ति के सामने सिर झुकाना नहीं है बल्कि मेरे लिए आस्तिकता का अर्थ है —

  • उस मिट्टी को सम्मान देना, जिससे मैं बना हूँ

  • उस हवा को धन्यवाद देना, जो मुझे साँस देती है

  • उस पानी को पूजना, जो जीवन है

  • उस सूर्य को प्रणाम करना, जो बिना भेदभाव रोशनी देता है


क्या नहीं है प्रकृति में?

  • जीवन है

  • मृत्यु है

  • सृजन है

  • विनाश है

  • न्याय है

  • संतुलन है

पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह प्रकृति से ही तो है।

तो फिर मैं पूछता हूँ — क्या ईश्वर प्रकृति से अलग हो सकता है क्या ? अगर ईश्वर है, तो क्या वह प्रकृति के बाहर बैठा कोई शासक है या प्रकृति के भीतर बहती चेतना?


आज की अतिआस्तिकता ने ईश्वर को इतना छोटा कर दिया है कि वह जाति में बँट गया, धर्म में कैद हो गया, राजनीति का औज़ार बन गया। और जो सवाल करे, उसे अधर्मी कह दिया जाता है।

पर मैं मानता हूँ —सवाल करना ईश्वर का अपमान नहीं, बल्कि उसे समझने की सबसे ईमानदार कोशिश है। शायद मैं नास्तिक नहीं हो रहा, शायद मैं बस पाखंड से दूर जा रहा हूँ। शायद मैं उस ईश्वर को छोड़ रहा हूँ जो डर सिखाता है, और उस आस्था को चुन रहा हूँ जो जिम्मेदारी सिखाती है।


अगर पेड़ काटकर पूजा हो,
अगर नदी को गंदा कर आरती हो,
अगर इंसान को कुचलकर जयकारा हो —
तो ऐसी आस्तिकता से मेरा नाता टूटना ही बेहतर है।

मैं उस आस्था में विश्वास करता हूँ
जो —

  • इंसान को इंसान से जोड़ती है, 

  • प्रकृति को माँ स्वरूप समझती है, उसे सर्वशक्तिमान समझती हो 

  • जीवन को उत्सव मानती है और मृत्यु को भी उसी शांति से स्वीकार करती है


मैंने महसूस किया है, कि आज की दुनिया में सबसे ज़्यादा डर ईश्वर से नहीं, ईश्वर के ठेकेदारों से लगता है।

जो कहते हैं —

  • ऐसे मानो, वरना दंड मिलेगा

  • ऐसे चलो, वरना राष्ट्रद्रोही हो

  • ऐसे सोचो, वरना अधर्मी हो

आस्था अगर स्वतंत्रता छीन ले, तो वह आस्था नहीं, नियंत्रण है।


मुझे समझ नहीं आता, अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो उसे मेरे जैसे न जाने कितने इंसान के डरने या डर से भगवान को मानने की इतनी ज़रूरत क्यों है?

क्या सच्चा ईश्वर इतना असुरक्षित हो सकता है कि हर सवाल से आहत हो जाए? या फिर डरने वाले वे लोग हैं जिनकी सत्तासवालों से हिलती है?


आज हर जगह शोर है —

  • जयकारे का

  • नारों का

  • धर्म के नाम पर उग्रता का,

  • दूसरों को मारने, परेशान करने का 

लेकिन ईश्वर शोर में नहीं, मौन में मिलता है।

वह उस माँ की आँखों में है जो अपने बच्चे के लिए सब कुछ सह लेती है, वह उस किसान के पसीने में है जो बिना शिकायत धरती जोतता है, वह उस पेड़ की छाया में है जो किसी से पहचान नहीं पूछता।


मुझे कभी-कभी लगता है, हमने भगवान को इतना मानव बना दिया है कि वह भी हमारी तरह क्रोधी, पक्षपाती और बदले की भावना वाला हो गया है।

लेकिन प्रकृति को देखिए — वह बदला नहीं लेती, वह संतुलन बनाती है। जब हम उसे नुकसान पहुँचाते हैं,तो वह दंड नहीं देती, वह प्रतिक्रिया देती है। बाढ़, सूखा, गर्मी — ये क्रोध नहीं, परिणाम हैं।


शायद असली पाप मंदिर न जाना नहीं है, शायद असली पाप है —

  • नदी को मारना

  • जंगल को जलाना

  • जानवर को वस्तु समझना

  • और इंसान को महज एक संख्या मानना


मैं उस ईश्वर को नहीं मान सकता जो मेरे धर्म का होकर किसी और के दर्द से बेखबर हो। ईश्वर है, तो वह सभी का है — या फिर किसी का नहीं। आज युवाओं को सिखाया जा रहा है — “सिर्फ मानो, सवाल मत करो।” लेकिन इतिहास गवाह है — जिस पीढ़ी ने सवाल नहीं किए, उसने सिर्फ आदेश माने। और जो सिर्फ आदेश मानते हैं, वे नागरिक नहीं, भीड़ बन जाते हैं।


मैं नास्तिकता की ओर नहीं जा रहा, मैं जिम्मेदारी की ओर जा रहा हूँ।

जहाँ —

  • कर्म पूजा है, प्रधान है 

  • संवेदना धर्म है, इंसानियत है 

  • सत्य साहस है, हिम्मत है 

  • और प्रकृति ईश्वर है, सम्मान है 


लेकिन मैं लगभग आस्तिक ही हूँ चाहे आप जो भी कहें। 

किसी डर के कारण नहीं। मैं आस्तिक हूँ क्योंकि मैं प्रकृति को देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ, और उसके प्रति कृतज्ञ रह सकता हूँ। अगर कुछ लोग मुझे इन सब बात के लिए नास्तिक समझे तो यही सही। शायद एक दिन लोग कहेंगे —“वह नास्तिक था।” और मैं मुस्कुरा कर कहूँगा — “नहीं, मैं बस इतना आस्तिक था कि इंसान और प्रकृति दोनों को ईश्वर से कम नहीं समझ सका।”

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