हर एक दिन मन में एक सवाल उठता है—इस देश का युवा आखिर अपने भविष्य के बारे में क्या सोच रहा है? क्या वह सच में कुछ सोच भी रहा है, या बस बीते हुए मुद्दों में उलझकर अपने आज और आने वाले कल को नजरअंदाज कर रहा है?
विश्व आज युद्ध की जद में है । शायद पूरा भारत अभी रामनवमी के उल्लास में हैं। युवा क्या चिंतित है? क्या उसे डर है की उसका भविष्य क्या होने वाला है आने वाले कुछ 5- 10 साल में? क्या जो रोजगार(सरकारी, गैर सरकारी) में भी हैं क्या वो नहीं चिंतित हैं की शायद जितना कमा रहे हैं वो कुछ बचा नहीं पाएंगे।
क्या वह भी धीरे-धीरे एक ऐसी भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा है, जिसे बस मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान के इर्द-गिर्द ही दुनिया दिखाई देती है? क्या उसके सपनों की दिशा तय हो रही है, या वह दूसरों के बनाए हुए नैरेटिव में बहता जा रहा है?
क्या उसे सिर्फ मौज-मस्ती सूझ रही है? या कभी वह किसी चौराहे, चौक, चौपाल पर बैठकर देश-दुनिया की असल स्थिति, उसकी चुनौतियाँ और संभावनाएँ समझने की कोशिश करता है?
या फिर उसका संसार अब उसकी हथेली में सिमट चुका है—मोबाइल स्क्रीन में, जहाँ रील्स, शॉर्ट्स, लाइक्स और फॉलोअर्स ही नई पहचान बन गए हैं?
क्या वह अपनी ऊर्जा को कुछ बनाने में लगा रहा है, या सिर्फ समय काटने में? क्या वह सवाल पूछ रहा है, या सिर्फ फॉरवर्ड किए गए जवाबों पर भरोसा कर रहा है? क्या वह पढ़ रहा है, समझ रहा है, बहस कर रहा है—या बस स्क्रॉल कर रहा है? कभी-कभी लगता है, जैसे हम सब एक दौड़ में हैं, लेकिन मंज़िल किसी को साफ दिखाई नहीं दे रही। हर कोई भाग रहा है, पर क्यों—इसका जवाब शायद ही किसी के पास है।
क्या यह वही युवा है, जिसे देश की ताकत कहा जाता है? या वह धीरे-धीरे अपनी ही क्षमता से अनजान होता जा रहा है? और अब एक और सवाल—दुनिया जिस दिशा में जा रही है, क्या युवा उस पर भी सोच रहा है? युद्ध, संघर्ष, तनाव—क्या ये सिर्फ खबरें हैं, या आने वाले समय की चेतावनी?
क्या उसे इस बात का डर नहीं कि अगर कभी यह आग हमारे दरवाजे तक आ पहुँची तो क्या होगा? अगर किसी दिन शांति की जगह सायरन की आवाज़ें गूंजने लगीं तो? अगर हमारे आस-पास असुरक्षा का माहौल बन गया तो?
क्या उस समय हमारा स्मार्टफोन, हमारी रील्स, हमारे लाइक्स हमें बचा पाएंगे या फिर हमें एहसास होगा कि हमने असली दुनिया को समझने में देर कर दी? ये सवाल सिर्फ डराने के लिए नहीं हैं, बल्कि जगाने के लिए हैं क्योंकि भविष्य सिर्फ अपने आप नहीं बनता, उसे सोच, समझ और जिम्मेदारी से बनाया जाता है और यह सवाल सिर्फ युवाओं पर ही नहीं, हम सब पर है।
क्या हमने उन्हें सही दिशा दी? क्या हमने उन्हें सोचने, सवाल करने और समझने की आदत दी?
या हमने भी आसान रास्ता चुन लिया—चुप रहने का, या बस भीड़ का हिस्सा बनने का । शायद बहुत कुछ अब तक “राम भरोसे” चलता रहा है लेकिन क्या आगे भी ऐसा ही चलेगा?
मैं हर दिन ये सोचता हूँ—और शायद अब समय आ गया है कि हर युवा खुद से पूछे- मैं क्या कर रहा हूँ, और मुझे क्या करना चाहिए क्योंकि बदलाव की शुरुआत कहीं बाहर से नहीं,
यहीं से होती है—एक सवाल से, एक सोच से, एक जागरूक मन से और मैं…
राम भरोसे नहीं, सोच के भरोसे जीना चाहता हूँ।
Comments
Post a Comment