एक नया शहर
एक नया शहर
हर शहर जाने क्यूँ छीनता ही है
कुछ-बहुत कुछ,
और छीनता भी तभी है जब दिल लगा
बैठते हैं
घुटन और तड़प किसे बताएं किन-किन शहरों का
जाने क्यूँ समझता ही नहीं,
बस छीनता ही है।
शिला ये ही देना था तो बुलाया
क्यूँ पास तुमने?
पता तो था ना तुम्हें, दुत्कारा गया था पिछले
शहर में
आया तो था की होगा शायद
मरहम-ए-दिल पास तेरे
नमक सा बोझ जले पर रुला जाएगा
सोचा ना था ।
हर एक शहर में कहानी बनती है
सुना था,
पर मेरे खुद पर होगी कहानी जिसका
मजा लोग लेंगे
एक दिल के टूटने का गम तो कई बार
झेला था
पर एक इतना बड़ा शहर झकझोर जाएगा
सोचा ना था ।
गले से तो लगाया था मैंने
तुम्हें बड़े दिल से
थोड़ा समझ ना पाया कुछ कड़वाहट है
तेरे दिल मे
चलता हूँ फिर से एक नए शहर को
ढूँढने को
तेरा शुक्रिया अदा करता चलूँगा
दिल को पत्थर दिल करने का ।
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