समाज और चीत्कार
आज क्यों इतना रोष है? समाज आज क्यूँ जल रहा है?महिलायें इतनी व्यग्र क्यों हुई हैं? क्यों? क्योंकि आम बलात्कार तो हर दिन होता है। हर दिन लूटती है इज्जत। हर दिन नीलाम होती है इज्जत। हर दिन तार तार होती है इज्जत। तो आज क्यों जाग रहे हो?क्यों पहले समय नहीं मिला?सोचने का।
आज जागे इसलिए हैं क्योंकि बलात्कार अनोखे ढंग से हुआ है। जागे इसलिए हैं की सोचा नहीं था बलात्कार ऐसे भी हो सकता है। जागे इसलिए हैं क्यूंकी इस जघन्यता के बीच उसकी सांस अटकी पड़ी है। मर जाती या पूरी तरह बच जाती तो बलात्कार आम होता। आज कुछ खास हुआ है।
मीडिया की आंखे एक तरफ तो लड़की को कवर कर रही है, दूसरी तरफ मसाला दुंढ्ने में भी लगी है। बस कुछ दिन रुक जाइए , कोई नया धमाका आने तो दीजिये, फिर देखिये कैसे मीडिया काफ़ुर होती है वहाँ से। मसाला नहीं मिल रहा है ना। अभी तो इलाज चल रहा है। मरी थोड़ी है अभी।
खैर, मीडिया की औकाड और असलियत का तो सभी को पता है। यह खबर तो सुर्खियां बना दी गयी क्योंकि ये कूकृत्य अच्छे शहर में हुआ है- पढे लिखे अशभ्य , वहशी समाज में। उन शहरों का क्या जहां ना जाने कितने आम और खास तरीके से लुट रही हैं महिलायें। गावों का क्या? गाँव पीछे थोड़ी हैं। लोक-लाज ने बचा रखा है गावों को। बात बाहर तक नहीं आ पाती। खुद ही सल्टा लेते हैं। पता नहीं चलता ना। मीडिया इतनी सजगता से बलात्कार को क्यों परोसेगी चैनल पर। चकाचौंध , मसाला, दूधिया रौशनी कहाँ है उन फूश और पुवाल से भरे गावों में। खैर, आज जागे हो तो जागते रहना और पुरुष प्रधान समाज को ऐसा तमाचा जड़ना की याद रखे। ऐसा समाज रचो की प्रधानता महिलाओं में आ जाए। चंडी,दुर्गा,काली ये देवियाँ केवल मंदिरों में पूजा के लिया नहीं है, ये तो एक पद है कभी-कभार काबिज होने का। पुरुषों के गुरूर,अक्डूपन,और आक्रमण को खत्म करने का। चिल्लाकर अपना हक मांगना बंद करो-क्या मिला इतने सालों से। अरे ग्लोबलाइज वर्ल्ड है, हाथ मरोड़कर नाले में फेंक दो ऐसे नमकहराम , नपुंषक को की कल दोबारा हिम्मत जुटाने से पहले याद रखे। अगर जागना है तो घर से जागो। किसी के जगाने से कभी तुम्हारा भला नहीं होने वाला बल्कि भाला ही होगा।
अगर घर मे अत्याचार सहते हो तो बाहर क्यों डरते हो? बाहर भी सहो। बस, यही शब्द- सहनशीलता गलत सीखा दी माओं ने अपनी बचियों को। कहीं भी हो चुपचाप अपने टेशुओं को बहाकर दिल हल्का कर लो। अरे दिल हल्का करना है तो ऐसे हलकट को थप्पड़ मार कर करो। दिल, तन, मन सब हल्का हो जाएगा। बहरहाल, इस जघन्यता की परिभाषा कैसे बयान करूँ? पुरुष हूँ,पर समझ सकता हूँ।
बलात्कार सिर्फ उसके तन का नहीं होता बल्कि उसके मन का होता है,विश्वास का होता है,अस्तित्व का होता है,कल्पनाओं का होता है,सपनों का होता है।
अगर आप चाहते हो की सुरख्छित रहे तो आपको आगे आना ही होगा। सिर्फ एक दिन नहीं हर दिन आना होगा।
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