'तो बात बनेगी'


मजा तो खूब आया इन 20-22 पचीस सालों में रईसजादे बनकर, पैसे-रुपए लूटाने में।(एज फिक्स नहीं किया है।एज पता तो है पर आप लोग अपने-अपने हिसाब से अपने उम्र के एकोर्डिंग रख लेना। वैसे भी उम्र छुपाने का क्रेज़ जो है आज कल।) । अच्छा है हम भारत की नागरिकता धारण किए हुए गणमान्य बालक-बालिका हैं। वरना अगर विदेश में हुए होते तो बात ही जुदा होती। ना मम्मी का पता ना ही पापा का। अकेले छूट गए होते इन पारिवारिक जुड़ाव से।
बहरहाल, इस्टाईल मारना तो हमने तभी शुरू कर दिया था जब से उम्र के साथ 'टीन' शब्द जुडने लग गया था। दोस्तों, यारों को देखकर पैंट,जाने कब जीन्स बन गयी ?और मम्मी के हाथ से कंघा लेकर जाने कब खुद ही आईने के सामने घंटो बाल सवारने जाने लग गए। जाने कब से गूँथे हुए बाल खुलकर के हवा में लहराने लग गए। लेटैस्ट ट्रेंड क्या है मम्मी को ही बताने लग गए। जिद्द करते करते वैसलिन की डिबिया बैग में आ गयी और होंठ फटने का बहाना करने लगे। खैर वैसलिन तो एक बहाना था। साज और शृंगार का खूब सारा समान जो दोस्तों को दिखाना था। फिर तो आलम ये हो गया की बैग में बुक और कॉपी हो न हो, कंघा, काँच, पिन्न, जरूर होने लगी। एक अलग ही स्टेटस मैंटेन करने का रुतबा शुरू हो गया। एक नयी बिरादरी ही बन गयी हमारी, जहां हर दिन कुछ ना कुछ नया चाहने लगे। और जिस दिन कुछ नया नहीं तो 'बोरिंग, फटटू, और जाने क्या-क्या?(पब्लिक में लिख रहा हूँ बाकी आपलोग तो समझदार हो ही) दिनों को ही भला बुरा कहने लगे।
मम्मी को कैसे बताते की चेंज क्यूँ आने लगा है, हमारे अन्दर? भई बिरादरी में नाक कैसे कटाते? टिफ़िन में जब रोटी और अचार ले आते तो बेचारी रोटी को छुपकर घर में खाते थे। मैगी, पास्ता के सामने कहाँ टिक सकती थी अपनी बौनी सी रोटी। दो-दो बार झूठ बोलना पड़ता था-एक तो अपनी बिरादरी में की आज जल्दबाजी में लंच लेकर आना ही भूल गए। दूसरा-पैरेंट्स की बिरादरी को कि आज पेट में दर्द था इसलिए खाना नहीं खा पाये। मारा तो गया पेट बेचारा। खैर, स्टेटस मैंटेन करना भी तो जरूरी है, वरना हमारा वर्चुअल समाज हमें बे-दखल कर देता।
पापा को क्या पता-भई हम बैक-बेंचेर्स असोशिएशन के मेम्बर्स जो ठहरे.क्या-क्या करते आखिरी में कोने कि सीट में बैठकर, छुपकर। को-एडुकेशन कब कोको एडुकेशन हो गया पता नहीं चला। मेरी वाली, मेरा वाला,तेरी वाली, तेरा वाला-एक अलग ही रिश्तेदारी शुरू हो गयी।
धीरे धीरे जाने कब फैबरएट शाहरुख से टॉम क्रूज बन गया और ऐश्वर्या से माइली साइरुस हो गयी। पता नहीं चला इतनी फटाफट बदलाव का? कान फाडु मूजीक पर पैर और सिर कब से कदमताल करने लगा समझ से परे था। पता नहीं, इयर फोन कब से कान में ठूंस कर पढ़ने में मज़ा आने लगा। पहले पहल जो शोर लगा करता था, जो डिस्टर्ब करता था-कॉन्संट्रेट करने में आज उसी से दोस्ती कर ली थी। उम्र में टीन जुडते-जुडते जनरल नॉलेज पता नहीं सिर्फ रिपब्लिक और इंडिपेंडेंट डेट के इर्द गिर्द ही मंडराता रहा। बाकी का बचा खुचा जुच्केर्बेर्ग साहेब (फेस्बूक वाले)पर छोड़ दिया, अपडेट तो करते ही रहेंगे। अपडेट नहीं किया तो किसको पड़ी है समाज,राजनीति,बिज़नस वगैरह-वगैरह को जानने की।
     बात बात में हाइ फाइव देने की आदत सी हो गयी - खासकर तब, जब कुछ नहीं आता तो कुछ ज्यादा ही खुश होते। कुछ ना समझ आने की शर्मिंदगी को कब का फेंक दिया। अगर कोई अपडेटएड दोस्त ने पूछ लेता कोई सवाल तो खैर नहीं उस चशमिश की। शामत ला देते थे बेचारे की, घर जाकर कोसता, की क्यूँ बिरादरी से अलग होता जा रहे हूँ मैं, क्यूँ मैंने सवाल कर दिया उनलोगों से। गायज़ तो मासाअल्लाह थे ही। गल्ज़ कहाँ कम थी -एट्टीट्यूड तो फटाक से आता उनके जुबान पर। जुबान पर नहीं आया तो खुद ही उतर जाती एट्टीट्यूड पर। अंग्रेज़ी के वही घिसे पीटे 10-12 शब्द कोसते खुद को, जब कहीं बात शुरू हो जाये तो तो शामत मनाते हुए दिखते की आज जी भर के रौंदा जाऊंगा। टेक्नालजी के नाम पर सिर्फ ब्रांड का नाम और कलर ही कोन्फ़िगरैशन के अंदर आता। गायज़ तो खैर अपडेट रख लेते खुद को तकनीकी से, अपडेट करने के लिए ड्रेस कहाँ था पास में, तो टेक्नालजी ही सही।
पर थोड़ा रुकिए!, अपने कर्तव्य और नियमों का पालन तो करें. क्या हम अपनी सांस्कृतिक, धरोहर और विरासत खोते को जा रहे है। कहीं हम विदेशीयत में तो नहीं जीने को बढ़ते जा रहे हैं। हम और आप इस देश के जिम्मेदार नागरिक बनने को अग्रसर हैं. हमारा खुद का अपनापन कहाँ गुम होता जा रहा है। शायद एक जूस्तजू सी है आगे बढ्ने की। पर खुदा के लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता को साथ लेकर उसे सँजो कर, सहेज कर चलें 'तो बात बनेगी'

Comments

Popular posts from this blog